Khatu Shyam खाटू श्याम अर्थात् बरबरीक सनातन धर्म में अत्यंत प्रिय देवता हैं खास का मारवाड़ियों के लिए विशिष्ट है। जिनके मंदिरों में भव्यता और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इनकी पूजा, जागरण और भंडारा बड़े उत्साह से मनाए जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि खाटू श्याम बरबरीक के रूप में महाभारत से जुड़े एक दिव्य योद्धा हैं ? इस लेख में हम बरबरीक की उत्पत्ति, उनकी महिमा और उनके साथ जुड़ी विभिन्न कथाओं का विस्तार से चर्चा करते हैं ।

Khatu Shyam – खाटू श्याम कौन हैं ?
Khatu Shyam की असली पहचान बरबरीक से जुड़ी है, जो घटोत्कच के पुत्र थे। घटोत्कच स्वयं भीम के पुत्र थे, लेकिन राक्षस जाति से संबंधित थे। इस वजह से यह प्रश्न उठता है कि घटोत्कच के पुत्र होने के बावजूद बरबरीक देवता कैसे कहलाए। बरबरीक का उल्लेख महाभारत में प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिलता, लेकिन स्कंदपुराण के महेश्वर खंड के कौमारिका खंड में उनका विस्तृत वर्णन है।
Khatu Shyam ( बरबरीक )का परिवार
बरबरीक की माता का नाम काम कटंकटा या मौरवी बताया जाता है। इनके पिता घटोत्कच के राक्षस होने के बावजूद बरबरीक को देवी भगवती की कृपा प्राप्त थी और उन्होंने विजय नामक ब्राह्मण की सेवा करते हुए उनकी तपस्या की ।
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Khatu Shyam (बरबरीक) के तीन भाई थे – बरबरीक (स्वयं), अंजनपरवा और मेघ वर्ण। महाभारत में अंजनपरवा का उल्लेख है, जो पांडवों के पक्ष में वीरगति को प्राप्त हुए। घटोत्कच भी महाभारत युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। बरबरीक ने अपने परिवार के बुजुर्गों को नहीं देखा था, लेकिन उन्होंने भगवती की तपस्या और ब्राह्मणों की रक्षा में अपनी वीरता दिखाई।
Khatu Shyam – बरबरीक की शक्ति और दिव्य अस्त्र
बरबरीक को विजय नामक ब्राह्मण ने भगवती की तपस्या की सिद्धि के बाद दिव्य सिंदूर और भस्म प्रदान किया। इस सिंदूर में लोक संहारक शक्ति थी जिससे वे युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखा सके। उन्हें अक्षय तरकस और दिव्य खड़ग भी प्राप्त हुए।
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महाभारत युद्ध के दौरान बरबरीक ने अपनी सामर्थ्य प्रदर्शित करते हुए कहा कि वे एक ही मुहूर्त (लगभग 48 मिनट) में पूरी कौरव सेना का नाश कर सकते हैं। उन्होंने अपने दिव्य अस्त्रों का परीक्षण भी किया और युद्ध में निशाना लगाने की क्षमता दिखाई।
महाभारत युद्ध और बरबरीक का वध
जब बरबरीक ने अपनी ताकत का प्रदर्शन किया, तो सभी योद्धा उनके पराक्रम से प्रभावित हुए। परंतु भगवान कृष्ण ने उनकी शक्ति को देखकर उनका मस्तक काट दिया, क्योंकि यदि बरबरीक युद्ध में सक्रिय रहते तो युद्ध का परिणाम बहुत जल्दी और अप्रत्याशित हो जाता।
बरबरीक की मृत्यु पर भीम और पांडवों का मन अत्यंत दुखी हुआ। परंतु देवी चंडिका ने बरबरीक के मस्तक को अमृत से अजर अमर कर दिया और उसे दिव्य स्वरूप प्रदान किया। इसके बाद बरबरीक को देवता के रूप में पूजनीय माना गया।
बरबरीक और सूर्यवर्चा यक्ष की कथा
बरबरीक का पूर्वज सूर्यवर्चा यक्ष था, जो यक्षों के नायक थे। उन्होंने देवताओं के साथ पृथ्वी के भार का सामना करने का दावा किया, लेकिन ब्रह्मा देव ने उन्हें श्राप दिया कि वे युद्ध नहीं लड़ पाएंगे।
यह शाप बरबरीक के मस्तक के काटे जाने के पीछे की पृष्ठभूमि है। भगवान कृष्ण ने बरबरीक को माउंट आबू के पर्वत पर स्थान दिया, जहां से वे महाभारत युद्ध का निरीक्षण करते रहे। बरबरीक ने युद्ध के दौरान पांडवों के पक्ष में अपनी पूजनीयता और पराक्रम दिखाया।
Khatu Shyam (बरबरीक) की पूजा और उनका महत्व
खाटू श्याम Khatu Shyam (बरबरीक) की पूजा मुख्य देवताओं (शिव, विष्णु, दुर्गा आदि) की पूजा के स्थान पर नहीं की जानी चाहिए। वे क्षेत्रीय और राजसी देवता हैं, जिनकी पूजा सीमित विधि से होती है। बरबरीक को यक्ष कोटि के देवता माने जाते है और उनकी पूजा विशेष रूप से मारवाड़ी समुदाय में होती है। उनकी पूजा विधि, मंत्र और तिथि स्कंद पुराण में वर्णित हैं।
Khatu Shyam (बरबरीक) की पूजा वैशाख मास की त्रयोदशी तिथि किया जाता है। Khatu Shyam (बरबरीक) की पूजा का मंत्र स्कंद पुराण के महेश्वर खंड के कौमारिका खंड में वर्णित है । इस मंत्र को पढ़ने से Khatu Shyam (बरबरीक) की प्रसन्नता होती है।
यह मंत्र सभी वर्गों के लिए उपयुक्त है और विशेष रूप से वैशाख मास की त्रयोदशी तिथि को 100 दीप जलाकर 100 बार पढ़ना शुभ माना जाता है। Khatu Shyam (बरबरीक) की पूजा में गुप्त क्षेत्र की आराधना महत्त्वपूर्ण है, जो कामाख्या तंत्र से जुड़ी है। उनकी पूजा में विशेष मंत्र का जाप किया जाता है जो उनके शक्तिशाली स्वरूप को प्रसन्न करता है।
Khatu Shyam (बरबरीक) और भगवान कृष्ण में अंतर
खाटू श्याम को बरबरीक के रूप में देवता माना जाता है, जो भगवान श्री कृष्ण से भिन्न हैं। कई बार लोग भ्रमित हो जाते हैं और खाटू श्याम को भगवान कृष्ण के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो शास्त्रों के अनुसार सही नहीं है।
बरबरीक और भगवान कृष्ण के व्यक्तित्व और भूमिका में स्पष्ट भेद है। बरबरीक एक यक्ष कोटि के देवता हैं, जबकि श्रीकृष्ण परम पुरुषोत्तम हैं। इसलिए पूजा और आराधना में भी इनका भेद समझना आवश्यक है।
Khatu Shyam (बरबरीक) की पूजा विधि और सावधानियां
आजकल खाटू श्याम महाराज के मंदिरों में जागरण और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है, लेकिन कई बार इसमें शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन होता है। भगवती राधा के साथ बरबरीक का नाम जोड़ना और अशोभनीय गीतों का निर्माण करना उचित नहीं है।
हर मंदिर में खाटू श्याम की मूर्ति लगाना भी सही नहीं माना जाता क्योंकि हर देवता की पूजा विधि और स्थान निश्चित होते हैं। अतः शास्त्रोक्त पूजा विधि का पालन करना आवश्यक है ताकि देवता की कृपा बनी रहे।
सारांश – खाटू श्याम ( बरबरीक ) की कथा महाभारत के पृष्ठभूमि से जुड़ी एक अद्भुत कथा है जिसमें वीरता, भक्ति और दिव्यता का मेल है। उनकी पूजा विधि और इतिहास को समझकर ही उनकी सच्ची महिमा को जाना जा सकता है। शास्त्रों के अनुसार उनकी पूजा विधि को अपनाना चाहिए और अंधविश्वास तथा अनुचित व्यवहार से बचना चाहिए।
बरबरीक की पूजा से धन, समृद्धि और सुरक्षा की प्राप्ति होती है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो त्याग और भक्ति के मार्ग पर चलना चाहते हैं।
